मुझमें तुम गीत बन रहो!

आज फिर से मेरी एक पुरानी रचना प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

मुझमें तुम गीत बन रहो,
मन के सुर राग में बंधें।

वासंती सारे सपने
पर यथार्थ तेज धूप है,
मन की ऊंची उड़ान है
नियति किंतु अति कुरूप है,
साथ-साथ तुम अगर चलो,
घुंघरू से पांव में बंधें।

मरुथल-मरुथल भटक रही
प्यासों की तृप्ति कामना,
नियमों के जाल में बंधी
मन की उन्मुक्त भावना,
स्वाति बूंद सदृश तुम बनो
चातक मन पाश में बंधे।

जीवन के ओर-छोर तक
सजी हुई सांप-सीढ़ियां,
डगमग हैं अपने तो पांव
सहज चलीं नई पीढ़ियां।
पीढ़ी की सीढ़ी उतरें,
नूतन अनुराग में बंधें।

यौवन उद्दाम ले चलें,
मन का बूढ़ापन त्यागें,
गीतों का संबल लेकर
एक नए युग में जागें।
तुम यदि संजीवनी बनो
गीत नव-सुहाग में बंधें।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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3 responses to “मुझमें तुम गीत बन रहो!”

  1. यौवन उद्दाम ले चलें,
    मन का बूढ़ापन त्यागें,
    गीतों का संबल लेकर
    एक नए युग में जागें। 👌

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  2. क्या कहने सुंदर 👌 नमस्कार 🙏🏻

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    1. हार्दिक आभार जी

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