देखिये न मेरी कारगुज़ारी!

आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी साहित्यकार, कवि और संपादक स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

अज्ञेय जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह अलग किस्म की कविता–

अब देखिये न मेरी कारगुज़ारी
कि मैं मँगनी के घोड़े पर
सवारी पर
ठाकुर साहब के लिए उन की रियाया से लगान
और सेठ साहब के लिए पंसार-हट्टे की हर दुकान
से किराया
वसूल कर लाया हूँ ।
थैली वाले को थैली
तोड़े वाले को तोड़ा
-और घोड़े वाले को घोड़ा
सब को सब का लौटा दिया
अब मेरे पास यह घमंड है
कि सारा समाज मेरा एहसानमन्द है ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “देखिये न मेरी कारगुज़ारी!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक आभार जी

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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