चुंबन के दो उदात्त वैष्णवी बिम्ब!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ साहित्यकार, संपादक एवं कवि स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की दो छोटी-छोटी रचनाएं शेयर कर रहा हूँ।

भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह कविताएं–


1.

रख दिए तुमने नज़र में बादलों को साधकर,
आज माथे पर सरल संगीत से निर्मित अधर,
आरती के दीपकों की झिलमिलाती छाँव में,
बाँसुरी रखी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर।


2.

उस दिन जब तुमने फूल बिखेरे माथे पर,
अपने तुलसी दल जैसे पावन होंठों से,
मैं सहज तुम्हारे गर्म वक्ष में शीश छुपा,
चिड़िया के सहमे बच्चे-सा हो गया मूक,
लेकिन उस दिन मेरी अलबेली वाणी में
थे बोल उठे,
गीता के मँजुल श्लोक ऋचाएँ वेदों की।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

2 responses to “चुंबन के दो उदात्त वैष्णवी बिम्ब!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

Leave a reply to samaysakshi Cancel reply