हाथों का उठना!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

प्रभाकर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत–


हाथों का उठना
कँपना
गिर जाना
कितने दिन चलेगा ?

कितने दिन और सहेंगे
वे कब चीत्‍कार करेंगे
कब तक होंगे वे तैयार
कब तक हुँकार भरेंगे ?

क़दमों का उठते-
उठते रूक जाना
कितने दिन और चलेगा ?

दरवाज़ों को खुलना है
गिरना है दीवारों को
लेकिन
कितने दिन तक और
चलना है अतिचारों को ?

आँखों का उठना
झुकना
मुँद जाना
कितने दिन और चलेगा ?
कँपना
गिर जाना
कितने दिन चलेगा ?

कितने दिन और सहेंगे
वे कब चीत्‍कार करेंगे
कब तक होंगे वे तैयार
कब तक हुँकार भरेंगे ?

क़दमों का उठते-
उठते रूक जाना
कितने दिन और चलेगा ?

दरवाज़ों को खुलना है
गिरना है दीवारों को
लेकिन
कितने दिन तक और
चलना है अतिचारों को ?

आँखों का उठना
झुकना
मुँद जाना
कितने दिन और चलेगा ?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “हाथों का उठना!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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