आज फिर से मेरी एक पुरानी कविता प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-
जड़ता के बावज़ूद।

चौराहे पर झगड़ रहे थे
कुछ बदनाम चेहरे,
आंखों में पुते वैमनस्य के बावज़ूद
भयानक नहीं थे वे।
भीड़ जुड़ी
और करने लगी प्रतीक्षा-
किसी मनोरंजक घटना की।
कुछ नहीं हुआ,
मुंह लटकाए भीड़
धाराओं में बंटी और लुप्त हो गई।
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अगले चौराहे पर,
अब भी जुटी है भीड़
जारी है भाषण-
एक फटे कुर्ते-पाजामे का,
हर वाक्य
किसी जानी-पहचानी-
नेता या अभिनेता मुद्रा में,
भीड़ संतुष्ट है यह जान
कि एक और व्यक्ति हो गया है पागल,
जिसके मनोरंजक प्रलाप
बहुतों को नहीं खोने देंगे
मानसिक संतुलन-
जड़ता के बावज़ूद।
(यह रचना भी मेरे काव्य संकलन ‘आसमान धुनिए के छप्पर सा’ में सम्मिलित थी।)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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