अब की यह बरस!

आज मैं हिंदी नवगीत विधा के अत्यंत श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

अब की यह बरस
बड़ा तरस-तरस बीता
दीवारें नहीं पुतीं, रंग नहीं आए
एक-एक माह बाँध, खींच-खींच लाए
अब की यह बरस

जाने क्या हो गया सवेरों को
रोगी की तरह उठे खाट से
रूखे-सूखे दिन पर दिन गए
किसी नदी के सूने घाट-से


हमजोली शाखों के हाथ-पाँव
पानी में तैर नहीं पाए

शामें सब सरकारी हो गईं
अपनापन पेट में दबोच कर
छाती पर से शहर गुज़र गया
जाने कितना निरीह सोच कर

बिस्तर तक माथे की मेज़ पर
काग़ज़ दो-चार फड़फड़ाए


वेतन की पूर्णिमा नहीं लगी
दशमी के चाँद से अधिक हमें
शीशों को तोड़ गई कालिमा
समझे फिर कौन आस्तिक हमें

खिड़की से एक धार ओज कर
हम आधी देह भर नहाए


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “अब की यह बरस!”

  1. बेहतरीन चयन! ‘वेतन की पूर्णिमा नहीं लगी, दशमी के चाँद से अधिक हमें’—इस एक पंक्ति ने जैसे सारी हकीकत कह दी। रंजक जी के नवगीतों में जो कसक होती है, वो यहाँ साफ दिखाई देती है। हिंदी साहित्य के ऐसे अनमोल मोतियों को अपने ब्लॉग के माध्यम से सहेजने और साझा करने के लिए शुक्रिया। पढ़कर बहुत अच्छा लगा।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी।

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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