आज फिर से मेरी एक पुरानी रचना प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

हे पिता
यदि हो कहीं, तो क्या लिखूं तुमको
बस यही, जो जिस तरह था
उस तरह ही है।
पत्र है अभिवादनों की शृंखला केवल
हम अभी जीवित बचे हैं, यह बताने को,
और आश्वासन इसी अनुरूप पाने को,
मैं न मानूं किंतु प्रचलन
इस तरह ही है।
हाल अपना क्या सुनाऊं, ठीक सा ही है,
गो कि अदना क्लर्क–
कल का महद आकांक्षी,
ओस मे सतरंगदर्शी बावला पंछी–
हो गया है, मुदित सपना, आपके मन का
जी रहा है, और जीवन
उस तरह ही है।
साथ हैं अब कुछ वही एहसास सपनीले-
वह फिसलने फर्श पर मेरा रपट जाना,
और चिंता से तुम्हारा आंख भर लाना,
बीच सड़कों, धुएं, ट्रैफिक के गिरा हूँ मैं
और यह ध्यानस्थ दुनिया-
उस तरह ही है।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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