गृहस्थ!

आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

प्राण-प्रतिष्ठा कर दी मैंने
सारे देवों के विग्रह में
फिर भी मूक-बधिर-अन्धे बन
वे सब मन्दिर में स्थापित हैं ।

मैं गंगोत्री से गंगाजल
ला उनका करता हूँ अर्चन
अपने खूँटे की गायों के
घी से करता हूँ नीराजन
फिर भी उनका पलक न झपके
आँखों से ना आँसू टपके
भक्तों की बेचैन भीड़ में
मैं पिसता हूँ, वे पुलकित हैं ।

मुझ गृहस्थ को दाना-पानी
जुट जाए तो सफल मनोरथ
कुछ संन्यासी होकर भी
चाहते पालकी, चाँदी का रथ
संत-रंग के कलाकार सब
ईश्वर से ज्यादा पूजित हैं ।

बैलों के संग सदा सुखी थे
डीजल पीकर मरी किसानी
भूत-प्रेत से ज्यादा डरती
टोपी से मित्रो मरजानी
माटी की मूरतें मौन हैं
चुप हैं सारे देवी-देवा
श्रद्धा के कच्चे धागे पर
चलने वाले लोग व्यथित हैं ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “गृहस्थ!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी ।

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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