कवि के मन की मौज!

आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

कविता में किस किसकी शामत
अब तक तुमने नहीं बुलाई,
रात को बना डाला दुल्हिन
झटपट से शादी रचवाई,

पता नहीं चलता कब किसको
किस हालत में तुम रख दोगे।

लिखा धूप पर, सूरज पर,
आवारा बादल पर लिख डाला,
मौसम की मदमस्त अदाओं को
कविता के बीच संभाला,


सब्र करो, क्या मौसम पर,
मौसम सा अत्याचार करोगे!

कितनी भाव-भंगिमाओं को
है कविता में जांचा-परखा,
सच में क्या निःसंग भाव से
तुमने उनको देखा-निरखा,

तुम तो नृत्य कला में भी
लगता है बहुत सुधार करोगे।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।


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2 responses to “कवि के मन की मौज!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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