प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

कैसे-कैसे रूप सलोने
धर संताप मिले,
लिए रूप आशीषों का
हमको अभिशाप मिले।
यह दुनिया है, यहाँ सभी के
ढंग निराले हैं,
भोले लगते प्राणी
आफत के परकाले हैं।
सोच-समझकर मिलना भाई
सब लोगों से तुम
जाने कैसा छल कब
ओढे हुए लिहाफ मिलें।
नाट्य मंडली यह दुनिया
प्यासी है नोटों की
मंचों के पीछे पाओगे
भीड़ मुखौटों की
प्रेम खोजने भाई इस
रस्ते पर मत जाना
पृष्ठ भाग में छुरी छिपाए
भरत-मिलाप मिले।
चलते तो रहना है पर
रखने हैं सधे कदम
फिसलन वाली सतह
संभलना मुश्किल है हमदम,
एक चूक से जाने क्या
दुर्दिन का श्राप मिले।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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