सूरज देर से निकला!

प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

ढ़ते समय मुंडेर
कहीं क्या पांव था फिसला
आज सूरज
देर से निकला।

बचपन में तो साथ हमारे
जमकर खेले हो
अब क्यों सोच रहे सूरज
तुम निपट अकेले हो,

साथ तुम्हारे हैं हम अब भी
यह साथ नहीं बदला।

हम बूढे़ हो गए
खेल वैसे न पाएंगे
समय तुम्हारे साथ मगर
हम कभी बिताएंगे

तुम हो बालक सुबह, शाम को
वृद्ध हो किबला।

मैदानों में तो लोगों को
तुम खूब छकाते हो
पहुंच पहाड़ों पर लेकिन
हाँफ से जाते हो,

शीत में दिखता तुम्हारा
रूप है धुंधला।

भारतीयों को दिखाते
खूब हो तुम बल
किंतु योरप में पहुंच
दिखते तनिक निर्बल,

पश्चिमी आब-ओ-हवा
देती तुम्हें पिघला!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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6 responses to “सूरज देर से निकला!”

  1. एक बहुत ही सुंदर और चिंतनशील कविता। मुझे यह पसंद है कि कैसे यह सूर्य और समय के प्रवाह के साथ खेलती है, निकटता, मित्रता और एक सौम्य उदासी को दर्शाती है। इसका एक गर्मजोशी भरा और मानवीय स्वर है जो जीवन और उसके चक्रों पर चिंतन करने के लिए प्रेरित करता है।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी।

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  2. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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  3. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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