प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

चढ़ते समय मुंडेर
कहीं क्या पांव था फिसला
आज सूरज
देर से निकला।
बचपन में तो साथ हमारे
जमकर खेले हो
अब क्यों सोच रहे सूरज
तुम निपट अकेले हो,
साथ तुम्हारे हैं हम अब भी
यह साथ नहीं बदला।
हम बूढे़ हो गए
खेल वैसे न पाएंगे
समय तुम्हारे साथ मगर
हम कभी बिताएंगे
तुम हो बालक सुबह, शाम को
वृद्ध हो किबला।
मैदानों में तो लोगों को
तुम खूब छकाते हो
पहुंच पहाड़ों पर लेकिन
हाँफ से जाते हो,
शीत में दिखता तुम्हारा
रूप है धुंधला।
भारतीयों को दिखाते
खूब हो तुम बल
किंतु योरप में पहुंच
दिखते तनिक निर्बल,
पश्चिमी आब-ओ-हवा
देती तुम्हें पिघला!
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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