आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री इसाक अश्क जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
अश्क जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री इसाक अश्क जी का यह नवगीत –

बिना टिकिट के
गंध लिफाफा
घर-भीतर तक डाल गया मौसम।
रंगों
डूबी-
दसों दिशाएँ
विजन
डुलाने-
लगी हवाएँ
दुनिया से
बेखौफ हवा में
चुम्बन कई उछाल गया मौसम।
दिन
सोने की
सुघर बाँसुरी
लगी
फूँकने-
फूल-पाँखुरी,
प्यासे
अधरों पर खुद झुककर
भरी सुराही ढाल गया मौसम।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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