गीत अलग ही सुर में!

आज प्रस्तुत है एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

गीत अलग ही सुर में गाया जा सकता था,
पीड़ा का एहसास दबाया जा सकता था।

मुख जब दंतविहीन हुआ तब ज्ञान मिला ये
कोई और जुगाड़ लगाया जा सकता है।

दावत खाकर घर आए तब सोचा हमने,
छोड़ा बहुत, और कुछ खाया जा सकता था।

छूट गया जो साथ सोचते हैं हम अक्सर
कुछ दिन तक तो और निभाया जा सकता था।

होते यदि समूह का हिस्सा मिलतीं ताली,
लेकिन गीतों का सरमाया जा सकता था।

इतने भी तो दूर नहीं हैं बंधु अभी हम,
कभी-कभी तो आया-जाया जा सकता था।

एक समय था, जब सिग्नल के ना आने पर
एंटीना को खूब घुमाया जा सकता था।

फिरते थे बेफिक्र ज़माने भर में हम तब
क्या वो जज़्बा वापस लाया जा सकता था।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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2 responses to “गीत अलग ही सुर में!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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