आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

कितना समझाओगे विभीषण
क्या मान जाएगा दशानन।
कोई लाभ नहीं है मित्र
जिसके कांधों पर दस सिर हैं
ऐश्वर्य, अहंकार, सामाजिक प्रतिष्ठा
वह कैसे झुकेगा किसी के सामने
भले ही वह ईश्वर ही क्यों न हो।
खुद तुम घर के भेदी कहलाओगे,
करुणा निधान के समक्ष
दीन भाव से प्रस्तुत होते ही
प्रेम के बल पर
तुम पा जाओगे वह ऐश्वर्य
हठी रावण ने पाया था जिसे
दस सिर अर्पित करके।
मेरे प्रभु की लीला ही ऐसी है
और यहाँ अधिक प्रभावी है
प्रेम-विनय,
रावण का हठयोग नहीं,
लेकिन प्रेम का मार्ग तो
रावण के लिए संभव नहीं है
अपनाना।
यहाँ दीन सुदामा हो
या भक्तिलीन विभीषण
वे पा जाते हैं
वह सब कुछ, बिना मांगे
जिसको अहंकारी और हठी
कठिन तपस्या से पाते हैं।
परंतु भले ही
ईश्वर के प्रति समर्पित हो तुम
लोग तुमको घर का भेदी ही
कहेंगे
भले ही तुमने रावण का
पद प्रहार भी सहा हो
उसे अहंकार के मार्ग से हटाने हेतु।
खैर अपना अपना मार्ग है
दुनिया में
रावण और विभीषण का
और अपनी-अपनी
नियति भी।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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