आज मैं प्रसिद्ध जनकवि ज़नाब अदम गोंडवी जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
गोंडवी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अदम गोंडवी जी की यह ग़ज़ल –

जिसके सम्मोहन में पाग़ल, धरती है, आकाश भी है ।
एक पहेली-सी ये दुनिया, गल्प भी है, इतिहास भी है।
चिन्तन के सोपान पर चढ़कर चाँद-सितारे छू आए,
लेकिन मन की गहराई में माटी की बू-बास भी है ।
मानव-मन के द्वन्द्व को आख़िर किस साँचे में ढालोगे,
महारास की पृष्ठभूमि में ‘ओशो’ का संन्यास भी है ।
अमृत की बूँदें बरसी थीं तब हमने मुँह फेर लिया,
आज ख़ुशी से ज़ह्र पी रहे और इसका एहसास भी है ।
इन्द्रधनुष के पुल से गुज़रकर उस बस्ती तक आए हैं,
जहाँ भूख की धूप सलोनी चंचल है बिन्दास भी है ।
कंक्रीट के इस जंगल में फूल खिले पर गन्ध नहीं,
स्मृतियों की घाटी में यूँ कहने को मधुमास भी है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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