एक बार फिर से आज मैं वरिष्ठ हिंदी कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत–

नज़रिए हो गये छोटे हमारे
मगर बौने बड़े दिखने लगे है
चले इंसानियत की राह पर जो
मुसीबत में पड़े दिखने लगे हैं
समय के पृष्ठ पर हमने लिखी थी
छबीले मोर पंखों से ऋचाएँ
सुनी थी इस दिशा में उस दिशा तक
अंधेरो ने मशालों की कथाएँ
हुए है बोल अब दो कौड़ियों के
कलाम हीरे- जड़े दिखने लगे हैं
हुआ होगा कही ईमान मँहगा
यहाँ वह बिक रहा है नीची दरों पर
गिरा है मोल सच्चे आदमी का
टिका बाज़ार कच्चे शेयरों पर
पुराने दर्द से भीगी नज़र को
सुहाने आँकड़े दिखने लगे हैं
हमारा घर अजायब घर बना है
सपोले आस्तीनों में पले है
हमारे देश हैं खूनों नहाया
यहाँ के लोग नाखूनों फले हैं
कहीं वाचाल मुर्दे चल रहे हैं
कही ज़िंदा गड़े दिखने लगे हैं
मुनादी द्वारका ने यह सुना दी
कि खाली हाथ लौटेगा सुदामा
सुबह का सूर्य भी रथ से उतरकर
सुनेगा जुगनुओं का हुक्मनामा
चरण जिनके सितारों ने छुए वे
कतारों में खड़े दिखने लगे हैं
यहाँ पर मज़हबी अंधे कुए हैं
यहाँ मेले लगे है भ्रांतियों के
लगी है क्रूर ग्रहवाली दशा भी
महुरत क्या निकालें क्रांतियों के
सगुन कैसे विचारें मंज़िलो के
हमें सूने घड़े दिखने लगे हैं
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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