पाव भर कद्दू से रायता!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ उपन्यास एवं कहानी लेखिका और कवियित्री  सुश्री ममता कालिया जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

इनकी एक रचना मैंने पहले भी शेयर की हैं।  

लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री ममता कालिया जी की यह कविता –

एक नदी की तरह
सीख गई है घरेलू औरत
दोनों हाथों में बर्तन थाम
चौकें से बैठक तक लपकना
जरा भी लड़खड़ाए बिना

एक सांस में वह चढ़ जाती है सीढ़ियां
और घुस जाती है लोकल में
धक्का मुक्की की परवाह किए बिना
राशन की कतार उसे कभी लम्बी नहीं लगी
रिक्शा न मिले
तो दोनों हाथों में झोले लटका
वह पहुंच जाती है अपने घर
एक भी बार पसीना पोंछे बिना

एक कटोरी दही से तीन कटोरी रायता
बना लेती है खांटी घरेलू औरत
पाव भर कद्दू में घर भर को खिला लेती है
जरा भी घबराए बिना!

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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4 responses to “पाव भर कद्दू से रायता!”

    1. धन्यवाद जी

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  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

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