आज मैं हिंदी के विख्यात समीक्षक और कवि स्वर्गीय नामवर सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।
नामवर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नामवर सिंह जी का यह नवगीत–

घन का गिरि, शिखर स्थित रवि
यह सरि वेला !
वन – उपवन सुरभि सजग
मलय वलय बेला !
कनक मेखला – मण्डित
सहस जलद शिखर असित
तरु तरु पर किरन नमित
रंजित खग मेला ?
क्षितिज लग्न नव जलधर
हंस के उगे ज्यों पर
घन की सित लहर लहर
सैकत उर्मि — रेला !
कुहर गन्ध अन्ध पवन
वाष्प धुन्ध उर दर्पण
ईख – हास पर सुबरण
किरन ने उँड़ेला !
शुभ, तब मुखड़ा सुन्दर
दृग में जाता ज्यों तर
मन्द – मन्द त्यों सरि पर
तिरता वह भेला !
खड़ा – खड़ा सरि – तट पर
रोता महुआ झर – झर
पी रहा नयन में भर
मैं तुम्हें अकेला !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to Nageshwar singh Cancel reply