तुम और मैं : दो आयाम!

आज मैं वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।                 

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता –

(एक)

बहुत दिनों के बाद
हम उसी नदी के तट से गुज़रे
जहाँ नहाते हुए नदी के साथ हो लेते थे
आज तट पर रेत ही रेत फैली है
रेत पर बैठे–बैठे हम
यूँ ही उसे कुरेदने लगे
और देखा कि
उसके भीतर से पानी छलछला आया है
हमारी नज़रें आपस में मिलीं
हम धीरे से मुस्कुरा उठे।

(
दो)

छूटती गयी
तुम्हारे हाथों की मेहँदी की शोख लाली
पाँवों से महावर की हँसी
आँखों से मादका प्रतीक्षा की आकुलता
वाणी से फूटती शेफाली
हँसी से फूटती चैत की सुबह
मुझे लगा कि
मेरे लिये तुम्हारा प्यार कम होता जा रहा है
मैं कुछ नहीं बोला
भीतर–भीतर एक बोझ् ढोता रहा
और एक दिन
जब तुमसे टकराना चाहा
तो देखा
तुम ‘तुम’ थीं कहाँ?
तुम तो मेरा सुख और दुःख बन गयीं थीं।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

                                     ********

2 responses to “तुम और मैं : दो आयाम!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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