आज एक बार फिर मैं, हिन्दी नवगीत के श्रेष्ठ हस्ताक्षर श्री अनूप अशेष जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|
अशेष जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह नवगीत –

हम सूखे बादल को जीते
किन दरवाज़ों
दिन आषाढ़ के।
अपने भीतर धूप उगी-सी
दूब किसी जंगल में,
टेर टिटिहरी की
खोते-से
सुबह-शाम
हर पल में।
दरकी छाती में बोए-से
किस्से कितने
नदी-बाढ़ के।
रेत झाड़ कर उड़े पखेरू
खोल-खोल डैने,
ऐसा शाप
सभी जन्मों में
पाया है मैंने।
उँगली का गीलापन सूखा
गर्म-हवा में
फूल काढ़ के।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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