आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के आधुनिक कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
अशोक वाजपेयी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

मैं अपनी खिड़की से पुकारना चाहता हूँ
कि सामने के चर्च में
प्रार्थनाओं और दीपशिखाओं के बीच
ईश्वर हो सके;
कि सामने के वृक्षों पर
हरियाली और धूप हो सके;
कि आकाश अपनी धूमिलता छोड़कर
नीला निरभ्र हो सके;
मैं पुकारना चाहता हूँ
कि दरवाज़ा खुले
अन्दर आए रोशनी;
कि मेरी पुकार
प्रार्थना बनकर टिक सके;
फूल बनकर खिल सके।
आँसू बनकर झर सके।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to R. Marshall Cancel reply