आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
राही जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत –

अगर न दर्द मिटा मन से गत का, आगत का हर्ष व्यर्थ है,
केवल वर्ष बदल जाने से, जीवन नहीं बदल जाता है
व्यर्थ अर्चना यह नवीन की, व्यर्थ नये का यह स्वागत है
अगर मोह बनकर प्राणों से, अब तक लिपटा हुआ विगत है,
मन विपरीत चले चरणों के अगर समझ लो, राह खो गई
आगे बढ़ना और नज़र रखना पीछे की ओर ग़लत है।
वही पुराने मूल्य, मान्यताएं, अब भी युग को घेरे हैं
केवल शब्द बदल जाने से, चिंतन नहीं बदल जाता है।
अधर गीत गा रहे तुम्हारे, पर लोचन की कोर सजल है
खुशी नये की किन्तु गये की करुणिम सुधि में सांस विकल है
बंटे हुए मन से तो कोई पर्व नहीं मन पाया अब तक
मत पूजो नूतन को, मन में अगर विगत का मोह प्रबल है।
मुस्कानों के क्षीण आवरण में कब अश्रु छिपा करते हैं
हंसने का अभिनय करने से रोदन नहीं बदल जाता है।
आज जलाये दीप वही जो नई सुब्ह का आराधक हो
आज मनाये हर्ष वही जो नई पौध का अभिभावक है
यह उनका त्यौहार नहीं जो अंधभक्त हैं परम्परा के
आज सुनाये गीत वही जो नये जागरण का गायके हो
फूंक न पाओ नई चेतना प्राण-प्राण में तो मत गाओ
केवल बीन बदल जाने से, गायन नहीं बदल जाता है
अगर न दर्द मिटा मन से गत का, आगत का हर्ष व्यर्थ है
केवल वर्ष बदल जाने से, जीवन नहीं बदल जाता है।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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