आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

तुम आए, बोझिल पलकों के
आँसू वन्दनवार हो गए
रूप-राशि दर्पण भर आँगन
दोनों एकाकार हो गए
अधराधर सी गए, झुके दृग
कैसे करें पीर अगवानी
कल जो प्यास गगन छूती थी
आज हो गई पानी-पानी
उपालम्भ से भरे, अधलिखे
छन्द मंगलाचार हो गए
कुटिया शीशमहल-सी दमकी
जगह-जगह भुजबन्धन झूले
समय– लगा स्नेह का गुणनफल
तन झूमा मन की ख़ुशबू ले
मेरी निर्धनता को तेरे
बाजू नौलखा हार हो गए
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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