
आज हरियाणा चुनावों के बहाने कुछ चर्चा करने का मन हो रहा है| वैसे चुनाव तो उसके साथ ही जम्मू कश्मीर में भी हुए थे, लेकिन वो तो मेरे लिए अलग दुनिया है, कभी वहाँ गया भी नहीं हूँ और वहाँ के राजनैतिक समीकरणों की मुझे अधिक जानकारी नहीं है, जबकि हरियाणा के गुड़गांव में तो मैं 5 साल रहा भी हूँ और मैंने अब तक जो दो बार वोट डाला है उसमें से एक बार गुड़गांव में था|
पहली बात तो ये कि मुझे कांग्रेस का इस बार का विज्ञापन कैंपेन बहुत अच्छा लगा, जिसमें दिखाया गया कि कांग्रेस सरकार आने के बाद माँ अपने बच्चे के बटुए में कुछ नोट डाल देती है, ये कहते हुए कि बटुआ खाली नहीं रखना चाहिए और दादाजी अपनी पोती की चप्पल टूट जाने के बाद उसे नई चप्पल खरीदने के लिए पैसा दे देते हैं, क्योंकि माँ को और दादा जी को भी विज्ञापन के अनुसार कांग्रेस सरकार आने के बाद सरकार से पेंशन अथवा आर्थिक सहायता मिलने लगी है| विज्ञापन कहता है कि कांग्रेस का ‘हाथ बदलेगा हालात’ |
ये विज्ञापन वास्तव सीधे आम नागरिक के दिल को छूते हैं, यद्यपि लोगों को विश्वास कितना हो पाता है, वो अलग बात है, वैसे लोक सभा चुनावों में ‘खटाखट-खटाखट’ ने तो कुछ इलाकों में काफी प्रभाव डाला था| लेकिन यही खयाल आता है, आम आदमी पार्टी द्वारा शुरू की गई मुफ़्त रेवड़ी बाँटने की यह प्रथा क्या सही है, जबकि आज मजबूरी में सभी पार्टियां इसको अपनाने लगी हैं, वैसे तमिलनाडु में तो मुफ़्त राशन आदि की परंपरा बहुत पहले से हैं, जिसके कारण वहाँ कुछ क्षेत्रीय पार्टियां लंबे समय से अपने पैर जमाए हुए हैं|
यह भी लगता है कि अगर कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी और शायद किसी और भी छोटी पार्टी के साथ चुनावी तालमेल किया होता तो वह जीत जाती, लेकिन वहाँ तो हुड्डा जी और शैलजा जी तथा एक और वीर सुरजेवाला जी थे इनके अलावा , जो आपस में लड़ते हुए भी मान रहे थे कि वे जीत जाएंगे और फिर सत्ता में रहते हुए लड़ते रहेंगे|
खैर अब परिणाम आ चुके हैं जिनमें ‘किसान, जवान और पहलवान’ के मुद्दे भी नहीं चल पाए, हाँ विनेश फोगाट चुनाव जीतकर राजनीति के अखाड़े की पहलवान बन गईं|
खैर हरियाणा और जम्मू कश्मीर में जो लोग जीते उनको बधाई, ये भी एक उपलब्धि थी कि जम्मू कश्मीर में लोगों ने भारी उत्साह के साथ मतदान में भाग लिया और अब्दुल्ला परिवार का लंबे समय से चल रहा वनवास खत्म हुआ|
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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