एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और ईको सिस्टम दूर-दूर तक नहीं है, कम से कम मेरा यहाँ कोई साहित्यिक संपर्क नहीं है|
जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, लेकिन बाद में जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।
(मेरी इससे पहले शेयर की गई रचनाएं ‘श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनाएं’ शीर्षक के अंतर्गत पुरानी ब्लॉग पोस्ट्स में देखी जा सकती हैं|)
लीजिए आज प्रस्तुत हैं इस क्रम की अंतिम रचना –

बारिश
पानी में निर्विकार भीग रहे पेड़,
दूर तक सड़क गीली, चमकीली,
बजरी में छनतीं बूंदें रिस-रिस,
मौसम बरसात का,
देर से भले आया,
लेकिन जब बरसा पानी अविरल
रुके दफ्तर से लौट रहे बाबू, अफसर
खदानों के कामगार,
खोखे में पान के –
कत्थे – चूने की डिबिया, माचिस-बीड़ी,
भीग रहीं, सील रहीं बारिश में,
तब इस लेट-लतीफ़ मौसम पर भी नाराज हुए लोग कि
समय देखकर क्यों नहीं बरसता!
लेकिन यह मौसम भी क्या
साहब का मूड है
गरजेगा तो गरजेगा,
बरसेगा तो बरसेगा,
नहीं तो झुलसाएगा, पिघलाएगा!
लेकिन हैं निर्विकार
योगी से समाधिलीन पेड़
इन्हें नहीं शिकायत रहती मौसम से,
चलीं यदि आंधियां, उनके सुर में पत्ते चहकेंगे,
तब भी यदि होगा हद से हद
गिर जाएंगे निःशब्द,
तब भी शिकायत होगी आदमी को ही|
आदमी होना- शिकायती होना है,
मौसम होना शरारती होना है,
और पेड़ होना-
यही तो कुछ होना है|
छाँव-गंध, फल-फूल से भरा,
निःस्वार्थ, प्राणवायु दायक,
प्राणों का प्राण,
निर्विकार- जीवन-दायी जीवन|
आज के लिए इतना ही, और यह फिलहाल इस क्रम की अंतिम रचना है|
नमस्कार
********
Leave a reply to samaysakshi Cancel reply