एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और ईको सिस्टम दूर-दूर तक नहीं है, कम से कम मेरा यहाँ कोई साहित्यिक संपर्क नहीं है|
जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, लेकिन बाद में जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।
इस बीच कुछ और अधूरी सी रचनाएं पुराने कागजों में दिखाई पड़ गईं तो उनको भी धूप दिखा देता हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत हैं एक और रचना –

हे रत्नाकर!
अंतहीन प्रसार जल का,
बनती बिगड़तीं लहरें प्रतिपल,
क्षितिज के समानांतर रचतीं नया क्षितिज,
शुभ्र जल-दीवार लहरों की|
स्वाद तीता ज़िंदगी के सदृश इसका
किन्तु होता शक्ति का हुंकार मुखरित,
उफान में इस खारी गहराई के,
गहराई जिसमें-
असंख्य घोंघे, सीपियाँ, शंख
जीव, जन्तु, जहाज, नाव, मनुष्य
सब डूबते-उतराते,
झेलते, स्वीकार करते शक्ति लहरों की,
और इनकी शक्ति का जयनाद करता
डुबकियाँ लेता किनारे पर
एक विह्वल झुंड लोगों का|
चाँद पाने को मचलता जब
बावला यह हठी खारा जल,
सह नहीं पाते प्रबल आवेग इसका
मत्स्य खोजी मानवों के दल|
सहस्त्रों योजन परे उठता की या फिर उतरता सूरज
यूं लगे ज्यों गर्भ से इसके उपजता है
और उसमें थका-हारा लौट आता है|
किन्तु मानवने तुम्हारी इस विकट निस्सीमता को
माप डाला है अजेय!
हाँ मगर संभव हुआ है
देखकर, पढ़कर तुम्हारे बदलते तेवर,
और उसमें जब, जहां जो चूक जाता है
नहीं रहता वह निमिष भर में,
सामोआ लेते तुम उसे भी
गर्भ में अपने|
गूढ़ से भी गूढ़तर बनती पहेली
यूं तुम्हारी|
प्रलय के उपनाम तुम
निस्सीम, अतल , अशांत
जब कभी तुम शांत लगते हो
सिर्फ तब विस्तार होते हो,
अन्यथा तुम विकट गहराई
मचलती है मापने ऊँचाइयाँ जो
और जिसमें आंच से अपनी सजातीं
मोतियों से क्षण, समय की सीपियाँ|
हुआ ज्यों बिन्दु में अंकित
तुम्हारा आंतरिक सौन्दर्य!
आज के लिए इतना ही, कल अपनी कोई और रचना शेयर करने का प्रयास करूंगा|
नमस्कार
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