मेरी कुछ और रचनाएं-7    

एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और ईको सिस्टम दूर-दूर तक नहीं है, कम से कम मेरा यहाँ कोई साहित्यिक संपर्क नहीं है|

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, लेकिन बाद में  जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।


इस बीच कुछ और अधूरी सी रचनाएं पुराने कागजों में दिखाई पड़ गईं तो उनको भी धूप दिखा देता हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत हैं एक और रचना –

मैं कहाँ हूँ1

यह शायद

 नशा टूटने की स्थिति थी,

-मैं कहाँ हूँ-

उसने पूछा था|

और फिर खुद बताने लगा था-

वह जहां था, हम भी वहीं थे,

किन्तु उस जाल को-

उस तरह नहीं देख पा रहे थे|

हम जैसा कि मानते हैं,

मानते रहे,

जब कुछ नहीं रहता कारनामा

तब ईश्वर पैदा होता है|

पर वह बोल रहा था-

वैक्यूम इज़ इंपोसीबल

खाली जब रहता है कमरा

तब एक-दो- हजार मकड़ियाँ

पैदा होती हैं,

और होते हैं

उनके जाले|

समूचा कमरा उनकी महिमा से पुर जाता है|

शून्य नहीं रहता

कहता था वह|

हमारी चमत्कार लिप्सू निगाहें

अब भी किसी बिन्दु पर टिकी थीं

जो हमारी शांतिपूर्ण संरचना के अनुसार

न अणुबम था, न हथगोला

एक जीवित भ्रम था,

इसी बीच लौट आया था वह,

एक लंबी, तपती यथार्थ उड़ान के बाद,

हमारी दिमाग़ों में छपी-

रिकॉर्ड की गई दुनिया में,

फिर से पूछा था उसने –

मैं कहाँ हूँ

और इस बार हमने जो भौगोलिक उत्तर दिया-

उससे वह संतुष्ट था|

आज के लिए इतना ही, कल अपनी कोई और रचना शेयर करने का प्रयास करूंगा|

नमस्कार

                                    ********    

2 responses to “मेरी कुछ और रचनाएं-7    ”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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