एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और ईको सिस्टम दूर-दूर तक नहीं है, कम से कम मेरा यहाँ कोई साहित्यिक संपर्क नहीं है|
जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, लेकिन बाद में जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।
इस बीच कुछ और अधूरी सी रचनाएं पुराने कागजों में दिखाई पड़ गईं तो उनको भी धूप दिखा देता हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत हैं तीन छोटी रचनाएं –
1`.
किसी भयंकर त्रासदी का नाम लिखूँ
सोचता हूँ
अपना ही नाम सूझता है,
लिखता हूँ, फिर बैठ जाता हूँ
अगला दिन झेलने की तैयारी में|
तुम क्यों ऊब गए दोस्त
तुम भी तो कविता लिखते हो-
भला क्यों-
अच्छे खासे लगते हो,
बने रहो|
कविता भागते को युद्ध में डटाती है,
सुना है,
मुझे नहीं डटाया,
गीता मैंने पढ़ी नहीं
पर तुम क्यों भागते हो
कविता में|
****
2.
तुम मुझे देखना चाहते हो
रेडियो एनाउंसर
तुम्हारी महानताओं का
सधी-संवरी,अनुशासित आवाज़ में
बखान करने के लिए|
लेकिन खांसी के लिए माइक ऑफ
और औपचारिक हंसी के लिए ऑन
करना नहीं आता मुझे|
****
3.
कुछ ऐसे बेलाग बोल, जो सुनने को ललचाता हूँ,
कुछ ऐसे आशीष की जिनकी छाँह मुझे स्वीकार नहीं|
****
आज के लिए इतना ही, कल अपनी कोई और रचना शेयर करने का प्रयास करूंगा|
नमस्कार
********
Leave a reply to Nageshwar singh Cancel reply