मेरी कुछ और रचनाएं-2

एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और ईको सिस्टम दूर-दूर तक नहीं है, कम से कम मेरा यहाँ कोई साहित्यिक संपर्क नहीं है|

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, लेकिन बाद में  जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।


इस बीच कुछ और अधूरी सी रचनाएं पुराने कागजों में दिखाई पड़ गईं तो उनको भी धूप दिखा देता हूँ| लीजिए प्रस्तुत है आज की रचना-

मौन पर्व

मन ने निर्वासित हो, शब्द-शब्द को टेरा,

कोई आवाज़ नहीं|

बिंब औ प्रतीकों के, अश्वों को दुलराया,

भावों का चंदन रथ- चमकाया, महकाया,

राह आत्म-प्रेषण की क्या इतनी सीधी है

अपना कोई प्रयास पाँव नहीं चल पाया|

चाहा संप्रेषण तब, तार-तार को छेड़ा,

कोई सुर-साज़ नहीं|

बहुत हैं जिन्हें करतब शब्दों के भाते हैं,

रोज हाट में कोई नया गीत गाते हैं|

लेकिन जो गीत कहीं भीतर से आता है,

मन के वह रोम-रोम से रिसकर गाता है|

गीत वही गाने को कौन सा विजन ढूंढें,

इसको तो हाट नहीं!

आज के लिए इतना ही, कल अपनी कोई और रचना शेयर करने का प्रयास करूंगा|

नमस्कार

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5 responses to “मेरी कुछ और रचनाएं-2”

  1. बहुत सुंदर।

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  2. बहुत सुन्दर। मैं पिछले महीने गोवा आया था। अगली बार आना हुआ तो मिलने का अवसर चाहूँगा।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी, स्वागत है।

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  3. गरिमा मय है लिखते रहें हमारी शुभ कामना आपके साथ है नमस्कार 🙏🏻

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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