सचमुच, इधर तुम्हारी याद!

आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय त्रिलोचन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| | त्रिलोचन जी का मूल नाम वासुदेव सिंह था|

त्रिलोचन जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय त्रिलोचन जी की यह कविता –


आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय त्रिलोचन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| | त्रिलोचन जी का मूल नाम वासुदेव सिंह था|

त्रिलोचन जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय त्रिलोचन जी की यह कविता – 

सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई,
झूठ क्या कहूँ। पूरे दिन मशीन पर खटना,
बासे पर आकर पड़ जाना और कमाई
का हिसाब जोड़ना, बराबर चित्त उचटना।
 
इस उस पर मन दौड़ाना। फिर उठकर रोटी
करना । कभी नमक से कभी साग से खाना ।
आरर डाल नौकरी है। यह बिलकुल खोटी
है। इसका कुछ ठीक नहीं है आना जाना।

आए दिन की बात है। वहाँ टोटा टोटा
छोड़ और क्या था। किस दिन क्या बेचा-किना।
कमी अपार कमी का ही था अपना कोटा,
नित्य कुआँ खोदना तब कहीं पानी पीना।

धीरज धरो, आज कल करते तब आऊँगा ,
जब देखूँगा अपने पुर कुछ कर पाऊँगा।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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2 responses to “सचमुच, इधर तुम्हारी याद!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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