आज एक बार फिर मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय नरेश मेहता जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| |
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेश मेहता जी की यह कविता –

हिम, केवल हिम-
अपने शिवःरूप में
हिम ही हिम अब!
रग-गंध सब परित्याग कर
भोजपत्रवत हिमाच्छादित
वनस्पित से हीन
धरित्री-
स्वयं तपस्या।
पता नहीं
किस इतिहास-प्रतीक्षा में
यहाँ शताब्दियाँ भी लेटी हैं
हिम थुल़्मों में।
शिवा की गौर-प्रलम्ब भुजाओं सी
पवर्त-मालाएँ
नभ के नील पटल पर
-सूक्त लिख रहीं।
नीलमवणीर् नभ के
इस बर्ह्माण्ड-सिन्धु में
हिम का राशिभूत
यह ज्वार
शिखर, प्रतिशखर
गगनाकुल।
याक सरी
मर्वृषभ इस हिम प्रदेश में
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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