आज एक बार फिर मैं विख्यात कवि स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| आपकी कविताएं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में भी शामिल की गई थीं|
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर नारायण जी की यह कविता –

रात मीठी चांदनी है,
मौन की चादर तनी है,
एक चेहरा ? या कटोरा सोम मेरे हाथ में
दो नयन ? या नखतवाले व्योम मेरे हाथ में?
प्रकृति कोई कामिनी है?
या चमकती नागिनी है?
रूप- सागर कब किसी की चाह में मैले हुए?
ये सुवासित केश मेरी बांह पर फैले हुए:
ज्योति में छाया बनी है,
देह से छाया घनी है,
वासना के ज्वार उठ-उठ चंद्रमा तक खिंच रहे,
ओंठ पाकर ओंठ मदिरा सागरों में सिंच रहे;
सृष्टि तुमसे मांगनी है
क्योंकि यह जीवन ऋणी है,
वह मचलती-सी नजर उन्माद से नहला रही,
वह लिपटती बांह नस-नस आग से सहला रही,
प्यार से छाया सनी है,
गर्भ से छाया धनी है,
दामिनी की कसमसाहट से जलद जैसे चिटकता…
रौंदता हर अंग प्रतिपल फूटकर आवेग बहता ।
एक मुझमें रागिनी है
जो कि तुमसे जागनी है।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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