दीप थे अगणित !

आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं पर अपनी अमिट छाप छाप छोड़ने वाले कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

अज्ञेय जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| अनेक आधुनिक कवियों को आगे बढ़ाने में अज्ञेय जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता –


दीप थे अगणित :
मानता था मैं पूरित स्नेह है।
क्योंकि अनगिन शिखाएँ थीं, धूम था नैवेद्य-द्रव्यों से सुवासित,
और ध्वनि? कितनी न जाने घंटियाँ

टुनटुनाती थीं, न जाने शंख कितने घोखते थे नाम :
नाम वह, आतंक जिस का
चीरता थर्रा रहा था गन्ध-मूर्च्छित-से घने वातावरण को।
उपादानों की न थी कोई कमी।

मैं रहा समझे कि मैं हूँ मुग्ध। जाना तभी सहसा
लुब्ध हूँ केवल-कि ले कर जिसे अपने तईं मैं हूँ धन्य-
जीवन शून्य की है आरती!
बहा दूँ सब दीप! बुझने दो

अगर है स्नेह कम। सारी शिखाएँ लुटें। ग्रस ले धुआँ अपने-आप को!
मुखर झन्नाते रहें या मूक हों सब शब्द-पोपले वाचाल ये थोथे निहोरे।
जगा हूँ मैं : क्यों करूँ आराधना उस देवता की
जो कि मुझ को सिद्धि तो क्या दे सकेगा-
जो कि मैं ही स्वयं हूँ!

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

********

2 responses to “दीप थे अगणित !”

  1. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

Leave a reply to Nageshwar singh Cancel reply