आज एक बार फिर मैं हिन्दी के विख्यात आधुनिक कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
वाजपेयी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| अनेक आधुनिक कवियों को आगे बढ़ाने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

उसकी आँखें क्या देखती हैं :
पृथ्वी की कसमसाती कामना,
आकाश का नीला धीरज,
समुद्र की उत्तप्त अगाधता!
उसके हाथ क्या छूते हैं :
हवा की विवश अदृश्यता,
आग की सिर उठाती लौ,
वृक्ष की संकुचित शिराएँ।
उसका शरीर याद करता है :
अनुराग की टिमटिमाती दीपशिखाएँ,
त्वचा का उल्लसित कम्पन,
शरीर में समाने की अधीर हड़बड़ी।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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