आज एक बार फिर मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय और श्रेष्ठ कवि रहे स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
सरोज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का यह गीत –

जब तक कसी न कमर,तभी तक कठिनाई है
वरना,काम कौनसा है, जो किया न जाए
जिसने चाहा पी डाले सागर के सागर
जिसने चाहा घर बुलवाये चाँद-सितारे
कहने वाले तो कहते हैं बात यहाँ तक
मौत मर गई थी जीवन के डर के मारे
जब तक खुले न पलक,तभी तक कजराई है
वराना, तम की क्या बिसात,जो पिया न जाए
तुम चाहो सब हो जाये बैठे ही बैठे
सो तो सम्भव नहीं भले कुछ शर्त लगा दो
बिना बहे पाई हो जिसने पार आज तक
एक आदभी भी कोई ऐसा बता दो
जब खुले न पाल,तभी तक गहराई है
वरना,वे मौसम क्या,जिनमें जिया न जाए
यह माना तुम एक अकेले,शूल हजारों
घटती नज़र नहीं आती मंजिल की दूरी
लेकिन पस्त करो मत अपने स्वस्थ हौसले
समय भेजता ही होगा जय की मंजूरी
जब तक बढ़े न पाँव,तभी तक ऊँचाई है
वरना,शिखर कौन सा है,जो छिया न जाए
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to samaysakshi Cancel reply