आज एक बार फिर मैं अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत लोकप्रिय और श्रेष्ठ कवि रहे स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत –

पुरानी पड़ी बीन पर राग नूतन,
अगर कवि न गाये, तो फिर कौन गाये?
कहाँ है वह दुनिया, जहाँ कवि न पहुँचे,
सुघड़ कल्पना से गढ़ी छवि न पहुँचे;
सुना है कि ऐसे भी थल हैं अनेकों,
जहाँ और की बात क्या रवि न पहुँचे।
वहाँ जागरण की अमर-ज्योति बनकर,
अगर कवि न जाये, तो फिर कौन जाये?
पुरानी पड़ी…
गरजते रहे घन घमंडों के मारे,
दमकते घिरे दामिनी के सहारे;
प्रमाणित हुए कीर्ति की कौमुदी से,
गगन में सदा चाँद, सूरज, सितारे।
तृषाकुल धरणि तक घटाओं की आँधी,
अगर कवि न लाये तो फिर कौन लाये?
पुरानी पड़ी….
विजन जानता है बहारों की सीमा,
छिपी मौन से कब पुकारों की सीमा;
नदी-नद सरोवर में अन्तर नहीं है,
ये सब मानते हैं किनारों की सीमा।
समय-सिंधु को लाँघने आगे बढ़कर,
अगर कवि न आये तो फिर कौन आये?
पुरानी पड़ी…
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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