आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
राही जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत –

गाऊँ जब तक गीत मीत, तुम जगते रहना
तुम मूंदोगे पलक तमिस्रा तिर आयेगी
गीतों के चंदा पर बदली घिर जायेगी
गीत गा रहा मैं कि तुम्हारी मेरे उर में-
गाती पागल प्रीत मीत, तुम सच-सच कहना
गाऊँ जब तक गीत मीत, तुम जगते रहना।
पतवारें तो साथ न प्रिय, मैं ले पाया था
क्योंकि बुलाया तुमने इसीलिए आया था
अब तुम कहतीं बढ़ो, बढ़ा जा रहा निरन्तर
मिले हार या जीत मीत, तुम संग-संग बहना
गाऊँ जब तक गीत मीत, तुम जगते रहना।
एक तुम्हारा रूप नयन में डोल रहा है
अधरों पर जीवन का अमृत घोल रहा है
सौ-सौ दोष लगाये जगती, या हो जाये-
निठुर नियति विपरीत मीत, मेरा कर गहना
गाऊँ जब तक गीत मीत, तुम जगते रहना।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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