आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अप्रतिम हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

पँखों भर आकाश बाँध कर
सपने ! बहुत बड़े हो जाते हैं
पर्वत सदृश खड़े हो जाते हैं
पल भर पहना कर
उजली पोशाक हमें
कर देते हैं स्थिति से
बेबाक हमें
सही आदमी के
शीशे के आदम से
बिना बात झगड़े हो जाते हैं
जब टूटे हम
गिरे अदृश्य पहाड़ी से
शाख सरीखे
कट कर किसी कुल्हाड़ी से
पूँजीकृत हरियाली खो कर
हम ख़ुद से
कुछ उखड़े-उखड़े हो जाते हैं
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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