आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि तथा मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
बेचैन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –

ऑफिस के
दरवाजों पर
कौन कह रहा चपरासी?
भारी-भारी तोपें हैं ।
कुछ कागज के
नोटों से
इनके मुँह खुल जाते हैं
वज़न कुर्सियों के,
इनकी बातों से
तुल जाते हैं
रिश्वतखोरी के
घर से
इनके बड़े “घरोपे” हैं।
भारी-भारी तोपें हैं।
लौटा दिया
इन्होंने ही
लंबी-चौड़ी
भीड़ों को
ये जेबों में
रखते हैं
ज़हर–उगलते
कीड़ों को
भीतर ज्वालामुखी अचल
बाहर चंदन थोपे हैं।
भारी-भारी तोपें हैं।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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