आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि, समीक्षक तथा बाबा नागार्जुन और फणीश्वर नाथ रेणु जी के संबंध में उल्लेखनीय पुस्तकें लिखने वाले स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
यायावर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं तथा वे फेसबुक पर मेरे मित्र भी थे|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत यायावर जी की यह कविता –

क़ातिलों का काफ़िला
दंगाइयों से मिल गया है
एक हंगामे में तब्दील हो गया है शहर
कोई नहीं सुन रहा किसी की
सिर्फ़ शोर-गुल
धमाके
धमाधम
धमधम
चारों ओर !
ऐसे में एक कविता
लहूलुहान
जान बचाती फिर रही है
कौन उसकी सुनेगा
अपने दिल में जगह देगा
करुणा से भरी पुकार सुनेगा
प्यार की आँखें बिछाएगा
स्वयं उसके हित में बिछ जाएगा ?
कविता मर रही है
हाँपती सी
लड़खड़ाती धूल-धुसरित
चल रही है
मानो स्वयं से लड़ रही है
मानो मानवीयता की लौ टिमटिमाती बुझ रही है !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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