आत्म अनात्म!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता-



समझ में आ जाना
कुछ नहीं है

भीतर समझ लेने के बाद
एक बेचैनी होनी चाहिए
कि समझ

कितना जोड़ रही है
हमें दूसरों से

वह दूसरा
फूल कहो कविता कहो
पेड़ कहो फल कहो

असल कहो बीज कहो
आख़िरकार
आदमी है !

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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4 responses to “आत्म अनात्म!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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  2. ऐसे नायाब हीरो ( शायरी, कविता , कहानी ) के पारखी शायद हमारी पीढ़ी के साथ ख़त्म हो जाएँगे !

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    1. जी, ऐसा ही लगता है, हर समय की जरूरतें भी अलग होती हैं।

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