प्रबल झंझावात, साथी!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी गीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
बच्चन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का यह गीत –


प्रबल झंझावात, साथी!

देह पर अधिकार हारे,
विवशता से पर पसारे,
करुण रव-रत पक्षियों की आ रही है पाँत, साथी!
प्रबल झंझावात, साथी!

शब्द ’हरहर’, शब्द ’मरमर’–
तरु गिरे जड़ से उखड़कर,
उड़ गए छत और छप्पर, मच गया उत्पात, साथी!
प्रबल झंझावात, साथी!

हँस रहा संसार खग पर,
कह रहा जो आह भर भर–
’लुट गए मेरे सलोने नीड़ के तॄण पात।’ साथी!
प्रबल झंझावात, साथी!

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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2 responses to “प्रबल झंझावात, साथी!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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