मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज अठारहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा, इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।
जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।
उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।
ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।
आज का गीत छोटा सा है। जैसा है आपके सामने प्रस्तुत है-
मौन यूं कवि मत रहो,
अब गीत उगने दो।
अनुभव की दुनिया के
अनगिनत पड़ाव,
आसपास से गुज़र गए,
झोली में भरे कभी
पर फिर अनजाने में,
सभी पत्र-पुष्प झर गए,
करके निर्बंध, पिपासे मानव-मन को-
अनुभव-संवेदन दाना चुगने दो।
खुद से खुद की बातें
करने से क्या होगा,
सबसे, सबकी ही
संवेदना कहो,
अपने ही तंतुजाल में
उलझे रहकर तुम,
दुनिया का नया
तंत्रजाल मत सहो,
आगे बढ़कर सारे
भटके कोलाहल में,
मंजिल के लिए
लालसा जगने दो।
मौन यूं कवि मत रहो,
अब गीत उगने दो।
-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’
आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।
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