मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज बारहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।
जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।
उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।
ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।
एक कविता आज प्रस्तुत है-
पेड़
पेड़ हमारी आस्थाओं का प्रतिफलन है,
पेड़ बनने के लिए ज़रूरी है
कि पहले हम ऐसा बीज हों-
जिसे धरती स्वीकार करे,
फिर धरती में रचे-बसे
रसों-स्वादों, मूल रसायनों से भी
हमारा तालमेल हो,
तभी हम धरती का सीना चीरकर
अपना नाज़ुक सिर, शान से उठा सकेंगे।
फिर यहाँ की आब-ओ-हवा, गर्द-ओ-गुबार
धूप और बरसात, जब सहन करेंगे
और दूसरों की इनसे रक्षा करेंगे,
तभी कहला सकेंगे- पेड़,
यह सब यदि संभव नहीं-
तो फिर शान से इंसान बने रहो,
जी भरकर नफरत करो दूसरों से,
और करो ऐसे काम, कि वे भी
आपसे नफरत करें।
कुदरत, सभ्यता, शिष्टता, नागरिकता के
जितने भी मापदंड हैं, नियम हैं
उन्हें शान से तोड़ो,
क्योंकि इंसान होने के लिए
सिर्फ इंसान जैसा दिखना ज़रूरी है।
उसके बाद तो इंसान सबसे ऊपर है,
अपनी पहचान रोज़ तोड़ता है-
फिर भी इंसान ही कहलाता है।
क्या ही अच्छा होता अगर
इंसान का भी, धरती से
ऐसा ही रिश्ता होता-
जैसा पेड़ का होता है।
तब यह दुनिया, बाहर से भी हरी-भरी होती
और भीतर से भी!
-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’
आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।
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