आत्मविज्ञापन का समय है, कवियों के भी टोले बने हुए हैं, ऐसे में अपना ढोल अपने आप ही बजाना पड़ता है| मैंने काफी पहले अपनी कुछ रचनाएं शेयर की थीं, एक बार फिर से उनको उसी क्रम में शेयर कर रहा हूँ|
मैं चाहता हूँ कि अपनी रचनाएं, जितनी उपलब्ध हैं, और याद आ रही हैं, एक बार यहाँ शेयर कर लूं, जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन अथवा ऑफ़लाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। वैसे तो मेरा संपादकों से, कविता के संप्रभुओं से कभी कोई निकट का नाता नहीं रहा।
एक बात और, मैं हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।
यह भी उल्लेख कर दूं कि मेरा जन्म दिल्ली में 23 अगस्त, 1950 को हुआ था, अधिकांश रचनाकर्म भी 1970 से 1980 के बीच दिल्ली-शाहदरा में हुआ, थोड़ा बहुत उसके बाद जयपुर, झारखंड, मध्य प्रदेश में लगभग 1990 तक हुआ। उसके बाद कविता लेखन बंद हो गया, गद्य कुछ मात्रा में लिखता रहा।
आज से मैं अपनी रचनाओं को विनम्रतापूर्वक शेयर कर रहा हूँ, ताकि रिकॉर्ड रह सके और आशा है कि आपको यह रचनाएं पसंद आएंगी। कविताओं को शेयर करने की शुरुआत उस गीत से कर रहा हूँ, जिसके आधार पर मैंने अपने ब्लॉग का नाम रखा था।
एक बात का उल्लेख और कर दूं कि दिल्ली-शाहदरा से अपनी यात्रा प्रारंभ करने के बाद, सेवा के दौरान देश में अनेक स्थानों पर रहने और 2010 में सेवानिवृत्ति के बाद, मैं कुछ वर्ष गुड़गांव में रहा और पिछले लगभग 7 वर्षों से पणजी, गोआ में रह रहा हूँ।
लीजिए आज से रचनाओं को शेयर करना प्रारंभ कर रहा हूँ-

गीत
आसमान धुनिए के छप्पर सा!
श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’
यहाँ वहाँ चिपक गए बादल के टुकड़े
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया।
मुक्त नभ में, मुक्त खग ने प्रेम गीत बांचे
थक गए निहारते नयन,
चिड़ियाघर में मोर नहीं नाचे,
छंदों में अनुशासित
मुक्त-गान खो गया॥
क्षितिजों पर लाली,
सिर पर काला आसमान
चिकनी-चुपड़ी, गतिमय
कारों की आन-बान,
पांवों पर चलने के
छींट-छींट विधि-विधान,
उमड-घुमड़ मेघ
सिर्फ कीच भर बिलो गया।
धुनिए के छप्पर सा आसमान हो गया॥
एक और अधूरी सी अभिव्यक्ति-
लिए चौथ का अपशकुनी चंदा रात
जाने हम पर कितने और ज़ुल्म ढाएगी,
कहने को इतना है, हर गूंगी मूरत पर
चुप रहकर सुनें अगर, उम्र बीत जाएगी।
आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।
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