आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठनवगीतकर स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
ओम प्रभाकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत-

चलें, अब तो यहाँ से भी चलें।
उठ गए
हिलते हुए रंगीन कपड़े
सूखते।
(अपाहिज हैं छत-मुँडेरे)
एक स्लेटी सशंकित आवाज़
आने लगी सहसा
दूर से।
चलें, अब तो पहाड़ी उस पार
बूढ़े सूर्य बनकर ढलें।
पेड़, मंदिर, पंछियों के रूप।
कौन जाने
कहाँ रखकर जा छिपी
वह सोनियातन
करामाती धूप।
चलें, अब तो बन्द कमरों में
सुलगती लकड़ियों-से जलें।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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