ज़िन्दगी नेपथ्य में गुज़री!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठकवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|

मालवीय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत-  

ज़िन्दगी नेपथ्य में गुज़री
मंच पर की भूमिका तो सिर्फ अभिनय है ।

मूल से कट कर रहे
परिशिष्ट में
एक अंधी व्यवस्था की दृष्टि में ।
ज़िन्दगी तो कथ्य में गुज़री
और करनी
प्रश्न से आहत अनिश्चय है ।

क्षेपकों के
हाशियों के लिए हम
दफ़न होते
काग़ज़ी ताजिए हम
ज़िन्दगी तो पथ्य में गुज़री
और मन बीमार का परहेज़ संशय है । 

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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2 responses to “ज़िन्दगी नेपथ्य में गुज़री!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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