आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठकवि श्री नरेश मेहता जी की एक कविता का पहला अंश शेयर कर रहा हूँ|
मेहता जी की अधिक रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नरेश मेहता जी की यह कविता-

यह महाराजा रन्तिदेव के अग्निहोत्र में
काटी गई सहस्त्रों गायों और बछड़ों के
बहे ख़ून से बनी नदी
यह वेदव्यास के शान्तिपर्व से निकली
एक अशान्त नदी
बेईमान शकुनी ने अपने पाँसे फेंके यहीं
सम्पत्ति और सिक्कों के बदले
पत्नी हारी गई यहीं
फिर पाँचो पतियों और पितामह की सहमति से
सबने उसके वस्त्र उतरते देखे
यह उसके आहत वचनों से
अभिशप्त नदी
चम्बल के तट तीर्थ नहीं,
प्राचीन सभ्यताओं का कोई नगर
न मेले पर्व तीज त्योहार
न पूजन हवन न मंत्रोच्चार
भयानक भायँ-भायँ सन्नाटा भरी
कटी-फटी विकराल कन्दराएँ चम्बल के आर-पार
क्षत-विक्षत कर डाली हो जैसे
ख़ुद अपनी ही देह किसी विक्षिप्त स्त्री ने सहसा धीरज खो कर,
टेंटी, करील, झरबेरी और बबूलों के जंगल में
उड़ती हू-हू करती रेत और सदियों का हाहाकार
चम्बल के तट तीर्थ नहीं हैं
उसके बारे में प्रसिद्ध है
दरस करे तो रागी होय
परस करे तो बागी होय
करे आचमन मूड़ सिराए
चम्बल तो बड़ भागी होय
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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