आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत-

सिरफिरी हवाओं के बल
उड़ा करे उजला बादल ।
सूरज से कौन अब डरे
कोहरा इतना हुआ घना
हरसिंगार को है यह गम
नागफनी क्यों न मैं बना !
पतझर के बहकावे में
अँखुओं ने पी लिया गरल ।
तुलसी की पौध रौंदते
शहरों से लौटे जो पाँव
शीशे-सा दरक गया है
लपटों में यह सारा गाँव
सूने आकाश के तले
भिक्षा को फैला आँचल ।
वादों की उड़ी जो पतंग
उलझ गई पाकड़ की डाल
अपने सन्दर्भ से जुड़ी
आँखों को गड़ते रूमाल
सपने बारूद बन गए
आह चिनगियाँ रहीं उगल ।
बिजली का शोर यों बढ़ा
बरगद तक हो गया बधिर
देवों के हाथ से फिसल
किसका-किसका हो मंदिर
पच्छिम का वह जादूगर
आया है पैँतरे बदल ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to samaysakshi Cancel reply